आजाद' की कहानी
कहानी आजादी से पहले 1920 के दौर में भूसर नामक काल्पनिक गांव में सेट है, जहां अंग्रेज एक लालची जमींदार (पीयूष मिश्रा) के साथ मिलकर गरीब जनता पर जुल्म ढाते हैं। इस गांव में अर्धकुंभ में घुड़दौड़ की परंपरा है, जिससे युवाओं में घोड़ों के प्रति विशेष लगाव होता है। ऐसे में, जमींदार के घोड़ों की देखभाल करने वाला एक नौजवान गोविंद (अमन देवगन) भी अपने घोड़े का सपना देखता है, जो एक गरीब के लिए बड़े दूर की कौड़ी है। एक बार गलती से जमींदार की बेटी जानकी (राशा थडानी) के घोड़े पर बैठने के चलते उसे कोड़े खाने पड़ते हैं। इसलिए, होली पर जानकी को रंग लगा देने के बाद जमींदार की सजा के खौफ में गोविंद गांव से ही भाग जाता है और बागी ठाकुर विक्रम सिंह (अजय देवगन) के खूबसूरत घोड़े आजाद के प्यार में पड़ जाता है।Read more
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बॉलीवुड में इंसान और जानवरों के प्यार, दोस्ती और वफादारी पर 'हाथी मेरे साथी' और 'तेरी मेहरबानियां' जैसी यादगार फिल्में बनी हैं। हालांकि, वक्त के साथ इन बेजुबानों के साथ इंसानी रिश्तों की कहानियां कम होती गईं, पर अब डायरेक्टर अभिषेक कपूर इस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए फिल्म 'आजाद' लेकर आए हैं, जिसका केंद्र एक घोड़ा है। अपनी फिल्मों से फरहान अख्तर, सुशांत सिंह राजपूत और सारा अली खान को बॉलीवुड में लॉन्च करने वाले अभिषेक कपूर इस फिल्म से भी दो नए चेहरों, अजय देवगन के भांजे अमन देवगन और रवीना टंडन की बेटी राशा थडानी को पर्दे पर उतार रहे हैं। फिल्म में इन दोनों नए एक्टर्स, खासकर अमन ने आत्मविश्वास भरी अदाकारी से खुद को लंबी रेस का घोड़ा साबित करने की बढ़िया कोशिश की है। Read more
गोविंद अब आजाद को पटाने की हर कोशिश करता है, लेकिन आजाद अपने सरदार विक्रम सिंह के अलावा किसी को घास भी नहीं डालता। जब तक कि अपनी आखिरी सांसें गिनते हुए वह खुद आजाद को गोविंद के हवाले नहीं कर जाता। हालांकि, ठाकुर को खोने के गम में दुखी आजाद फिर भी गोविंद को अपना सरदार मानने को तैयार नहीं होता, लेकिन एक बार जब उनका रिश्ता बन जाता है तो यह आजाद ना सिर्फ गोविंद को गांव का हीरो बना देता है, बल्कि पूरे गांव वालों को अंग्रेजों और जमींदार के जुल्म से आजाद करता है। यह करामात कैसे होता है? यह फिल्म देखकर पता चलेगा।
आजाद' मूवी रिव्यू
फिल्म के को-राइटर-डायरेक्टर अभिषेक कपूर निश्चित तौर पर इंसान और पशुओं की दोस्ती पर एक खूबसूरत कहानी लेकर आए हैं। लेकिन इसे कहने के लिए 1920 का जो दौर उन्होंने चुना है, उसे ठीक से पर्दे पर स्थापित नहीं कर पाए हैं। खासकर, अजय देवगन के बागी वाला ट्रैक बहुत ही कमजोर लगता है। आम जनता के लिए लड़ने वाले ठाकुर के प्रति गांव वालों का कोई जुड़ाव क्यों नहीं होता? ठाकुर किस तरह की लड़ाई लड़ता है? ऐसे लेयर्स की कमी खलती है।Read more
इसी तरह, जमींदार के बेटे-बहू मोहित मलिक और डायना पेंटी वाला ट्रैक भी खोखला रह गया है। जो जमींदार बहू-बेटियों को कुछ नहीं समझते, उन्हीं बहू-बेटी के साथ उनका एक टेबल पर खाना हजम नहीं होता। डायना और राशा की मॉडर्न आर्टिफिशियल जूलरी भी उस दौर की चुगली करती है। उस पर, फिल्म की लंबाई भी जरूरत से ज्यादा है। गोविंद और आजाद का रिश्ता स्थापित करने में काफी वक्त ले लिया गया है।Read more
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