देवा' की कहानी
एक सिरफिरे पुलिसवाले देवा (शाहिद कपूर) की कहानी फ्लैश बैक से शुरू होती है, जहां वह एक बहुत बड़े केस को हल करके लौट रहा होता है। तभी उसका एक्सीडेंट हो जाता है और उसकी याददश्त चली जाती है। देवा की याददाश्त जाने वाली बात की जानकारी सिर्फ उसके डॉक्टर और सीनियर फरहान (प्रवेश राणा) को है। दुर्घटना से पहले देवा ने फरहान को बताया था कि उसने केस सॉल्व कर दिया है। दबंग पुलिसवाला देवा मुजरिमों को बिना कोई प्रोटोकॉल फॉलो किए इतनी बेरहमी से मारता है कि उसके बारे में पत्रकार दीया (पूजा हेगड़े) भी लिख देती है कि वो पुलिस वाला है या माफिया? देवा को मुंबई के एक गैंगस्टर (मनीष वाधवा) की तलाश है, मगर जितनी बार देवा उसे पकड़ने की कोशिश करता है, उतनी बार वह गैंगस्टर पुलिस की पकड़ से भाग निकलने में कामयाब हो जाता है। पुलिस विभाग को शक है कि कोई अंदर का भेदिया है, जो बदमाशों से मिला है।
कहानी में दूसरा ट्रैक भी है, जहां देवा के भाई समान दोस्त रोहन (पावेल गुलाटी) की गोलीमार कर उसी दिन हत्या कर दी जाती है, जिस दिन उसे वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया जाना था। देवा अपने दोस्त और पुलिसवाले के कत्ल की तफ्शीस में जुट जाता है, मगर जब तक वह केस सॉल्व करता, उसकी याददाश्त चली जाती है।
याददाश्त जाने के बाद एक बार फिर देवा को रोहन का केस सौंपा जाता है। जैसे-जैसे देवा दोबारा केस की तह में जाता है, उसके हाथ सुराग लगते जाते हैं और अंत में जब उसे अपराधी का पता चलता है, तो उसके साथ-साथ दर्शक भी चौंक जाते हैं।
देवा' मूवी रिव्यू
पुलिस और गैंगस्टर की कहानी हिंदी फिल्मों में नई नहीं है। अनगिनत बार चोर-पुलिस की इस कहानी को बॉलीवुड में भुनाया जा चुका है। फिर निर्देशक रोशन एंड्रयूज की फिल्म की यह कहानी आज से तकरीबन 12 साल पहले आई 'मुंबई पुलिस' की रीमेक है, तो कहानी में नयापन का अभाव है। 2025 में आप इस कहानी से कनेक्ट नहीं कर पाते। फिल्म का स्क्रीनप्ले कमजोर है। फर्स्ट हाफ लंबा है और देखा जाए, तो असली कहानी इंटरवल के बाद शुरू होती है। आप जब क्लाइमैक्स में पहुंचते हैं, तो चौंकते जरूर हैं, मगर कई सवालों के जवाब नहीं मिल पाते।Read more
फिल्म में आपको हीरो के कई कारनामों की रीजनिंग नहीं मिलती। फिल्म खत्म होने के बाद आप सोच में पड़ जाते हैं कि आखिरकार हिंदी फिल्म का हीरो कैसा होना चाहिए? वो भले एंटी हीरो हो, मगर उसकी रीजनिंग तो सही होनी चाहिए। बहरहाल टेक्निकल टीम तारीफ की हकदार है। अमित रॉय की सिनेमैटोग्राफी जबरदस्त है। उनके कलर पैलेट का सिलेक्शन और कैमरा एंगल दिलचस्प है।
अनल अरासु, सुप्रीम सुंदर, विक्रम दहिया, परवेज शेख और अब्बास अली मोगुल के एक्शन दृश्य दमदार हैं। एडिटर के रूप में ए श्रीकर प्रसाद की एडिटिंग उम्दा है। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक शानदार है, मगर संगीत में दम नहीं है।Read more
शाहिद कपूर एक संवरे हुए अभिनेता हैं। यहां भी देवा के किरदार में उनका एरोगेंस, गुस्सा, स्टाइल, स्वैग और एक्शन खूब मनोरंजन करता है। याददश्त होने और उसके खोने वाले दो रूपों में वे प्रभावी रहे हैं, मगर क्लाइमैक्स में आकर उनकी सारी मेहनत तब ज़ाया हो जाती है, जब उनका किरदार जस्टीफाइड ही नहीं लगता।
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