फिल्म- कौशलजी vs कौशल
कास्ट- आशुतोष राणा, शीबा चड्ढा, पवैल गुलाटी, ईशा तलवार और बिजेंद्र काला
प्लेटफॉर्म- जियोहॉटस्टार
अब जमाना रील, वाईफाई और मीम का है। हमें कोई रील 3 सेकेंड तक अच्छी ना लगे तो हम बदल देते हैं। अब देखिए आप इस बात से इनकार मत करिए। ऐसे ही बाकी चीजों के साथ है। आज की जेनरेशन (जिसमें मैं भी शामिल हूं) का यही हाल है भाईसाब। घर के बाहर रहकर खुद को कूल समझते हैं। खाना ऑर्डर कर बच जाने पर 3 दिन तक खाते हैं। लेकिन घर पर मां पराठे में घी ज्यादा लगाए तो हेल्थ कॉन्शियस बनते हैं। रिश्ते जल्द से बनाते हैं और जल्द ही उससे मूव ऑन हो जाते हैं। अब भैया क्योंकि शहर में रहते हैं, तो सबके सामने खुद को कूल भी तो दिखाना जरूरी है। कई बार तो मां बाप को भी कूल वाला ज्ञान पेल देते हैं। ख़ैर आज बात वाई फाई और रील के जमाने वाले इमोशन की नहीं होगी। आज बात लैंडलाइन सरीखे मजबूत इमोशन की। क्योंकि फिल्म ही ऐसी आई है। जिसकी एक लाइन है, कई बार कुछ चीजें हमारे आंखों के सामने होती है। लेकिन हम उसे ऊपर ऊपर से देख लेते हैं। उसकी गहराई को महसूस नहीं कर पाते।Read more
यही कुछ हाल कन्नौज के साहिल कौशल के लड़के युग का है। साहिल अत्तर बनाने वाली फैक्ट्री में काम करते हैं। लेकिन उनकी रुचि संगीत में है और उन्हें कव्वाल बनना था। पत्नी संगीता घर संभालती हैं, लेकिन उन्हें अत्तर बनाने का शौक है। दोनों पति पत्नी अपने काम के साथ साथ शौक भी पूरे करते हैं। बेटा युग नोएडा में ऐड (विज्ञापन) बनाने वाली कंपनी में काम करता है। बेटी रीत एनजीओ में काम करती है। माता-पिता ने अपने सपने छोड़कर बच्चों के करियर को संवारने में लगे रहते हैं। युग अपने शहर और माता पिता से दूर रहता है। यहीं काम धाम करता है। घर आना बहुत ज्यादा पसंद नहीं है। हालांकि उनके जाने से माता-पिता का घर अब मकान बन गया है। लेकिन युग बाबू को इन सबसे कोई मतल नहीं है। जबकि उनकी माता पिता से एक बहुत बड़ी शिकायत है। वो ये है कि उनके मम्मी पापा कूल नहीं है और ना ही आधुनिक जीवनशैली और उस तरह के जीवन को अपना नहीं पा रहे हैं। लेकिन ऐसे हर चीज से मूव ऑन करने वाले युग को झटका लगता है। उसके मम्मी-पापा शादी के 25-30 साल बाद अलग हो रहे हैं। ये सुनने के बाद युग का क्या होगा? सोचा है? नहीं? नहीं सोचा ना? मैं बताऊं क्या होगा? खै़र जाने दीजिए... आप जो सोच रहे हैं वही हुआ। क्योंकि युग भी आप ही की तरह फिल्मी दुनिया की तरह जीवन जी रहा है? आपको और उसका लगता है कि दिल ना लगे सखा, तो चल कर लेते हैं मूव ऑन।Read more
इस फिल्म में आशुतोष राणा, शीबा चड्ढा, पवेल गुलाटी, ईशा तलवार, बिजेंद्र काला और दीक्षा जोशी अहम रोल में हैं। पिता, पति और कव्वाल के रोल में आशुतोष राणा ने कमाल किया है। उन्होंने किरदार उसकी उम्र और झुंझलाहट को बेहतरीन तरीके से पकड़ा है। वो इस रोल में एक दम सटीक बैठे हैं। वो पूरी फिल्म वैलिडिशेन के लिए तरसते हैं। जो फिल्म की शुरुआत से लेकर अंत तक दिखता है। शीबा चड्ढा इस फिल्म की जान हैं। उन्होंने एक मां और पत्नी के दोनों ही हिस्सों को अलग रखा है। जहां वो अपने बच्चों से बात करती हैं उनका रवैया अलग होता है। वहीं, पति के साथ बात करते हुए भी उनका रवैया काफी अलग होता है। ये उनकी एक्टिंग की उतकृष्टता भी है। इससे पहले भी उन्हें हम ऐसे किरदार में देख चुके हैं। पवेल गुलाटी दिन प्रति दिन अच्छा काम करते जा रहे हैं। एक बेटे के रूप में उनका काम गुडबाय फिल्म में देखा था। यहां भी वो बेटे हैं, लेकिन अंदाज अलग है। मिजाज उससे भी ज्यादा अलग है। ना सिर्फ डायलॉग से, बल्कि एक्सप्रेशन से भी वो काफी कुछ कह जाते हैं। आदर्श बालक के रूप में उनका काम अच्छा है। ईशा तलवार का शांत और सौम्य रूप इस फिल्म में देखने को मिला है। उन्हें जितना भी स्क्रीन स्पेस मिला है, उस हिसाब से उन्होंने न्याय भी किया है। इसके अलावा दीक्षा जोशी और बिजेंद्र काला का काम भी बेहतरीन है। कुल जमा एक्टर्स ने भी फिल्म को एक अलग लेवल पर पहुंचाया है।Read more
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